Friday, July 1, 2011

आखिर किसके थे वो ख्वाब ?


आखिर किसके थे वो ख्वाब ? जो दिखलाये थे तुमने मुझे ,
नहीं मांगे थे मैंने वो , ना चाहा था मैंने उनको |
नहीं देने आई थी मैं , अपना छोटा सा दिल , छोटी सी आशाये तुमको ,
ना माँगा था मैंने तुमसे कुछ , ना ही मेने कोई अधिकार जताया था |
तुम देने आये थे मुझे देने इक तोहफा |
जो मेरे काम का नही था |
नही चाहिये था मुझे वो तोहफा |
मगर फिर भी मैंने उसे रखा .. अपने पास ..संभाल कर |
किसी कांच के टुकड़े की तरह ध्यान रखा था मैंने उसका ,
नहीं टूटने दिया उसे .. नहीं मध्धम पड़ने दिया .|
ना समय की धूप से पिघलने दिया ,
ना दूरियों की बर्फ ही उसे जमा पाई ,
वो सुरक्षित था मेरे पास किसी अमानत की तरह |
सोचा था गर तुमने फिर से माँगा तो लौटा दूंगी |
नहीं रखनी थी मुझे किसी की भी अमानत
मगर अब
तुम खुद आ गए अपना खोया सामान लेने |
बोलो , कैसे दे दू मैं अब ?
नहीं मांगने आई थी मैं कुछ भी
जो लिया मैंने वो मुझे दिया गया था , तुम ही ने तो दिया था |
माँगा ना था मैंने |
बड़ी मुश्किल से , उस तोहफे को रखने का इक कमरा बना पायी थी मैं
 , बड़ी मुश्किल से
 अब उस कमरे को कैसे ढहां दू ?
ये कोई पुरानी ईमारत तो नही जो इस पे यू बुलडोजर चला दू  |

बोलों ?
नहीं लौटा सकती मैं अब .. दे भी दिया .. तो भी क्या जी पाऊँगी ?
ज़वाब तुम भी जानते हो |
फिर क्यों मुझे वो ख्वाब देखने पड़े ? जो कभी मेरे ख्वाब नही थे |
में भूल गयी थी की वो तो बस शबनम की इक बूंद है |
किसी हिरनी की सी इस मृग मरीचिका में फसी सोच रही थी ,
कहा जाऊ ? मैं रोई ...आंसू गिरे !
पर फिर भी तुम इन्हें पोंछने नही आये ,
शायद भूल गए थे तुम इन्हें पोंछने का तरीका |
या शायद यही भूल गए थे की ये सिर्फ तुम्हारे लिए ही थे |
मुड कर देखना भी भूल गए तुम !
मगर फिर भी तुम्हारी अमानत आज भी मेरे ही पास है |
कभी उनकी धूल हटा कर देखना |
वो ख्वाब  फिर सच होंगे ,, फिर जियेंगे |
फिर उठ खड़े होंगे |
क्युकी ,
अब मुझे भी ख्वाब देखने की आदत पड  चुकी है |  
इस लिए विश्वास है मुझे ..... फिर से सच होंगे वो ही ख्वाब  |
                                         
                                    आशिता दाधीच  

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