Friday, September 13, 2019

Love

उसने कहा तुम खूबसूरत हो,
तब जब पीरियड्स के दर्द से मेरी कमर झुकी थी।
दिन भर काम करके मैं थकान से हलकान थी।

उसने फिर कहा तू सबसे हसीं है,
तब जब मुझे वैक्स कराए दो महीने हो गए थे।
उसे मेरा ड्रेसिंग सेंस भाया तब जब मैं खुद से खफा थी।

बिन काजल सबको लगता है बीमार हूँ मैं पर उसे इन आँखो में बिना बाउंड्री की झील नजर आई।

चेहरे पर उभरे उस एक पिम्पल में उसे मेरी खूबसूरती का पहरेदार नजर आया।

उन बेतरतीब बढ़े नाखूनों में उसे गन्दगी से ज्यादा
मेरी व्यस्तता की मजबूरी समझ आई।

जब वो बाहों में समाया तो लगा कायनात सिमट आई
यों परिचित लगा वह स्पर्श जैसे जन्म जन्मांतर उसी की कामना थी।

क्योंकि उसे मैं तब खूबसूरत नजर आई जब
खूबसूरती मेरी बिछड़ी एक सखी थी।

- आशिता

Feeling of love

तुम महादेवी हो जाना
मैं गिल्लू बन जाउंगी।

तुम प्रेमचन्द की ईदगाह हो जाना
मैं चिमटे वाला हामिद बन जाउंगी।

तुम जो दिनकर हो जाओ।
मैं रश्मि रथ पर चढ़ आउंगी

तुम बस हरिवंश हो जाना
मैं साकि बाला बन जाउंगी।

तुम जयशंकर हो जाना
मैं कामायनी का सौंदर्य लुटाऊंगी।

तुम सूरदास हो जाना
मैं भ्रमर गीत हो जाउंगी

तुम तुलसी बन जाना।
मैं विनय पत्रिका हो जाउंगी।

चाहो तो बिहारी बन जाना
मैं रीतिकाल सी छा जाउंगी

या तुम चन्द का रासो हो जाना।
मैं तेरी संयोगिता हो जाउंगी।

जो न हो यह सब
तो नदिया हो जाना
मैं मछली जल की रानी हो जाउंगी
तेरे बिन बस मर जाउंगी।
- आशिता

Hug

तेरा वह पहला आलिंगन
लगा ही नहीं के किसी पौरुष युक्त पुरुष ने किया हो।
लगा जैसे मेरी अंतरात्मा ही मुझसे मिल रही हो।
अब तक के हर लिजलिजे एहसास से परे तेरे आलिंगन में सुरक्षा थी सम्मान था।
तेरा लक्ष्य अंगों को कचोटना नहीं रूह की मरम्मत कर देना था।
तू यो छुवा जैसे स्कूल से पहली बार रोती बिलखती आई मुझको पिता ने गोद लिया हो।
और फिर
तेरा वह प्रथम स्पर्श, लगा जैसे तुने मान दिया हो मेरे स्त्रीत्व को समाज के सम्मुख।
तेरे उस प्रथम आलिंगन में न मृगमरीचिका थी न ही कोई अफसोस।
था तो बस दो अधूरी आत्माओं का मिलन।
तेरा वो आलिंगन मेरे स्त्रीत्व का सम्मान था जो आज भी गर्व बनकर चमकता है मेरी आँख में।
- आशिता

Friday, December 28, 2018

Feminist

एक बेहद खुशकिस्मत लड़की की तरफ से दुनिया की तमाम बदकिस्मत महिलाओं और उनमें रहती पुरूषवादी सोच के लिए –
बहुत दिन बाद कुछ लिखा-

........हां, हम कहेंगे तुम्हें कुल्टा और कुलक्षिणी,
क्योंकि तुम जी लेती हो वो जिंदगी जो जीने का हक,
कभी नहीं मिला हमको इस समाज से।
जैसे तुम अकेले ही दो बलिश्त का स्कर्ट पहन कर,
नाप लेती हो दुनिया सारी,
ट्रेन में, बस में बिना ड़रे बिना किसी पुरूष पर निर्भर हुए,
जी लेती हो अपनी जिंदगानी।
बैंक जाकर कर आती हो फिक्स डिपोजिट
डर नहीं लगता क्या तुमको,
हम तो बचपन से पिता और पति के दिए पैसो से
चलाते है अपने घर को।
कहेंगे तुम्हें कुल्टा क्योंकि
तुम एक पलंग पर अपने बाप के कंधे पर हाथ रखकर बैठ जाती हो,
हमसे तो छिन लिया गया था यह हक
स्तनों के उगते ही।
तुम हो बदचलन क्योंकि जाती हो दफ्तर अकेले,
उसी समाज में जिस में छोटे भाई को,
साथ लेकर जाते थे हम सहेली के घर,
क्योंकि नहीं मिली इजाजत हमें अकेले जीने की।
जब तुम बाल लहरा कर सब्जी का थैला जमीन पर रख कर
अपने घर का ताला खोलती हो न तो सांप लौट जाता है सीने पर क्योंकि
तुमको मिली है इजाजत अकेले जीने की
कैसे जी लेती हो तुम बिना पुरूष पर निर्भर हुए
इसलिए ही कहते है हम सौ पुरूषों संग सोती हो तुम।
बिना पति और पिता के डर नहीं लगता तुमको,
हमने तो बचपन से सीखा है कि बाहर तैयार है भेड़िए नोचने को।
इन सबसे बचके जी लेती हो तुम
कैसे
क्यों
कहां से लाती हो इतना माद्दा जो योनि और स्तन वाले घर में घिरे हर प्राणी के नसीब नहीं आता।

(बेहद प्यार से पापा के लिए, शुक्रिया मुझे मैं बनाने के लिए)
- आशिता दाधीच

Saturday, May 13, 2017

A letter to Mother

मां,
आज तुम्हारे जन्मदिन के मौके पर पहली बार कुछ लिख रही हूँ तुम्हारे लिए शायद तुम्हे शब्दों में भर पाऊं, मेरे लिए तुम गंगोत्री की गंगा हो जिसकी शुभ्रता और निर्मलता के समक्ष में कानपुर की गंगा हूँ।
कभी कभी तुमसे बहुत नफरत होती है माँ, जानती हो क्यों, क्योंकि जैसे तुम चाहती हो मुझे, मैं उसका आधा भी नहीं चाह पाती तुम्हे, जो तुम दे देती हूँ सहजता से वो क्यों नहीं दे पाती मैं और फिर भी तुम्हे शिकायत नहीं होती।
जब मैं खुद को ऑफिस के काम में बिजी बता कर तुम्हारा फोन काट देती हूँ, तुम नाराज क्यों नहीं होती, गुस्सा क्यों नहीं करती जैसे मैं कर देती हूँ तुम्हारे द्वारा मेरा फोन काटे जाने पर।
तुम्हे पता है माँ मुझे तुमसे जलन होती है, तुम कितनी खूबसूरत हो और तुम्हारे वो कॉलेज वाले पिक्स, और मैं तुम्हारी दस फीसद भी नहीं। और हां मां कहां तुम इतनी बहादुर और कहां मैं इतनी डरपोक, कहां तुम इतनी जिजीविषा से भरी और कहां मैं थकी सी, कहां तुम सर्वदा ऊर्जा से भरी त्यागशील और कहां मैं स्वार्थी जीव।
सुना है मेरे बचपन में जब भी तुम खाना खाने बैठती थी तभी मुझे लेट्रिन आती थी और तुम थाली छोड़ दिया करती थी। फिर स्कूल में जब सड़क पर घुटने घुटने बरसाती पानी भर जाता था, तुम मुझे गोद में उठा कर घर लाती थी, तुम्हारे छोटे कद में मुश्किल होता होगा न पानी में चलना।
और जब क्लास के शैतान बच्चों ने मुझे सीढ़ियों से गिरा दिया था तब एक एक के घर गई थी न तुम उनके पैरेंट्स को उनकी शिकायत करने, लेकिन क्या तुम्हें सताने वालों से कभी मैं झगड़ पाई।
मां मैं हमेशा कहती हूँ न कि पापा स्वादिष्ट खाना बनाते है और तुम्हारा मुंह छोटा सा हो जाता है लेकिन सच कहूँ मां तृप्ति बस तुम्हारे बनाए खाने से ही आती है।
मैं हमेशा कहती हूँ न मां कि तुम्हे अच्छे कपड़े खरीदने की अक्ल नहीं है, लेकिन मैं जानती हूँ तुम जानबूझ कर सस्ती साड़ी खरीदते हो ताकि मुझे महंगे कपड़े दिला सको।
मां, मुझे पता है कि तुम मेरे लिए वो वनपीस क्यों लाई थी, क्योंकि तुम समझ गई थी कि मुझे वैसे ही कपड़े पसन्द है, दुकानों में उन कपड़ों को निहारते वक्त मेरी आँखें देख कर।
मां जब मैं कहती हूँ, तुम्हे कुछ नहीं आता,तुम कुछ नहीं समझती, तब तुम मुझे क्यों चांटा नहीं मारती, क्यों सह लेती हो, यदि तुम कुछ कहोगी तो मैं तो न सहूंगी मां ना।
उस दोपहर मेरी ब्रा का हुक लगाते तुमने मेरी पीठ के वो निशां भी देखे थे ना, दुनिया की नजर में मैं काला मुंह करवा चुकी थी तब तुमने क्यों बस मेरा ललाट चूमा मां और मुझे कुछ बोला तक नहीं।
जब मैं टूट रही थी, तकिये पर मुंह छिपा कर रोती थी रात रात, तुम समझती थी न, तभी तो मुझे फ़िल्म या रेस्टोरेंट होटल ले जाती रही तुम ताकि मेरा ध्यान बंट जाए लेकिन तुम तब भी कुछ न बोली।
मेरा एग्जाम था और तुम्हारी बहन मर गई तुम तब भी कुछ न बोली ताकि मेरा एग्जाम न बिगड़ जाए।
जब मैंने तुम्हारे फोन न उठाए क्योंकि मैं काम में थी तो उन रातों तुम भूखी सो गई लेकिन कुछ न बोली, क्यों मां, क्यों??
जब मेरे कुछ दोस्तों को तुमने बुरा कहा मैं झगड़ी तुमसे, खूब रोइ, लेकिन एक वक्त बाद वो सब सच में बुरे निकले, तुम्हे हर चीज कैसे पहले ही पता होती है माँ, ज्योतिषी हो क्या तुम?
जब मैं निराश होती हूँ कैसे एक हजार किलोमीटर दूर तुम्हे पता चल जाता है और तुम्हारा फोन आ जाता है।
मां क्यों तुमने तब भी कुछ नहीं कहा जब मैंने तुम्हें ये नहीं आता वो नहीं आता या तुम्हे कुछ नहीं समझता कहकर सैकड़ों बार तुम्हारा अपमान किया।
क्यों मां क्यों??
तुम्हारी नालायक बेटी

©आशिता दाधीच

Thursday, March 2, 2017

माँ

क्योंकि माँ सिर्फ माँ नहीं होती
वो जगदम्बा होती है
कभी गौर से देखना उसे
दिखलाई देंगे तुम्हे आठ आठ हाथ
चेहरे पर होगी वहीं लाली
तुम्हारे यानी अपनी बच्चों को बचाने की खातिर
चढ़ जाएगी वो शिव अपने पति की छाती पर
जूझ जाएगी वो अकेली
तनाव रुपी तुम्हे सताते उस रक्तबीज से।
चीर देगी वो सर तुम्हारी ओर आते कष्टो का चंड मुंड समझ कर।

कभी देखा है उसे रसोई में
खाना बनाते हुए
तेजी से बेलन दौड़ाते दोनों हाथ
तवे पर टिकी निगाहें
और
घड़ी को पछाड़ने की तेजी

तुम्हे तैयार भी कर देना
और
बस्ते से चुपके से पैसे भी रख देना।
बर्तन भी मांज लेना
और तुम्हारे मैले कपड़े भी धो देना।

क्या अब भी तुम्हे लगता है
उसे नहीं है जगदम्बा की तरह आठ आठ हाथ।

समेट लेती है
अपनी झोली में वो तुम्हारे सारे गम
और लुटा देती है
अपनी सारी खुशियां
तुम चाहे बना दो उसका जीवन अभिशाप
वो बस देती है वरदान
तब क्यों नहीं लगता तुम्हे
वहीं है
नवरात्रो वाली माता
जो मिटा देती है भक्तों के सारे गम।
- आशिता दाधीच

Wednesday, February 22, 2017

A Thank you note to all the males

दुनिया में मर्दों
आज मैं तुम सब से कुछ कहना चाहती हूँ।
दुनिया के मर्दों आज मैं तुम्हे शुक्रिया कहना चाहती हूँ।
क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ।
शुक्रिया मुझे दुनिया में लाने के लिए
शुक्रिया
तब मेरा हाथ थामने के लिए जब मैंने चलना शुरू किया डगमगा कर,
और तब से लेकर हर बार मेरा हाथ थामने के लिए
जब जब मैं डगमगाई।
शुक्रिया मुझे गन्दी नजरों से बचाने के लिए,
माँ से मेरे राज छिपाने के लिए
मेरे बस्ते में टॉफी छिपाने के लिए।
शुक्रिया मुझे पहली बार औरत होने का एहसास दिलाने के लिए,
मेरे कमर की गोलाइया पकड़ कर
मुझे खुद में भींच लेने के लिए,
मेरे होठों और दिल पर अपने निशां छोड़ने के लिए।
मेरे फुटबॉल से लटकते पेट को देख कर अपनी सीट छोड़ देने के लिए।
मेरे माथे पे पड़े बल को पीरियड्स का दर्द समझ कर मुझे घर तक छोड़ने के लिए।
मेरी काजल के मिलने से बहती काली गंगा को पोंछने हेतु मेरा रूमाल बनने के लिए।
डगमगा कर माँ माँ चिल्लाते हुए मेरी तरफ दौड़ कर आने के लिए।
सुनसान रास्ते पर मेरी लिए ऑटो खोजने के लिए।
न जाने कितनी बार खुद को समेट कर मुझे रास्ता देने के लिए।
मेरे पिज़्ज़ा, आइसक्रीम और चॉकलेट की पसन्द का ख्याल करने के लिए।
दुनिया की गन्दी नजरों से बचाने के लिए मुझे अपनी ओट में छिपाने के लिए।
हर बार मुझे इज्जत से देखने के लिए
शुक्रिया दुनिया के मर्दो
मुझे बारिश में भीगती देख कर अपने रेनकोट देने के लिए।
शुक्रिया दुनिया के मर्दो
क्योंकि
तुम मेरी शक्ति हो
मेरा साहस हो
और
मेरा प्यार हूँ
इसलिए मुझे तुम्हे आज थैंक्यू कहना है
और
हां
वो एसिड फेंकने वाले
बेटियों को पेट में मारने वाले
बहु को जलाने वाले
फब्तियां कसने वाले
बलात्कार करने वाले
वो सब मर्द होते ही कहा है
वो तो नामर्द है
नपुंसक सारे
इसलिए
दुनिया के मर्दो मुझे
तुमसे
प्यार है।
और मुझे तुम्हे शुक्रिया कहना है।
©आशिता दाधीच

Friday, February 10, 2017

Nothing like Lear #RajatKapoor #VinayPathak #Play

विनय पाठक क्या चाहते थे तुम, बेहद सर्दी जुखाम होते हुए भी मैं छींक भी न सकूं क्योंकिं वो एक छींक कुछ नैनों सैकंड मुझे नथिंग लाइक लियर नहीं देखने देगी, या मैं उठूं प्ले के बीच और जाकर गिर पडूँ अपनी माँ के पैरों पर या पापा को फोन लगा कर रोऊँ बहुत रोऊ उन्हें हजारों बार तकलीफें देने के लिए, आई एम् बीजी कह कर उनका फोन कट करने के लिए, एक बेहद बुरी बेटी होने के लिए।
या फिर विनय पाठक मैं यह सोचूँ कि तुम मंगल ग्रह से आए कोई एलियन हो, इतना मंत्रमुग्ध कैसे कर सकते हो तुम बस उस डेढ़ घण्टे में।
रजत कपूर कैसे हास्य, रौद्र, करुण, जुगुप्सा और शांत रस को एक साथ पिरों दिया तुमने, शेक्सपियर की आत्मा भी झूम उठी होगी इस अडॉप्शन पर।
पल में भाई से डरता युवक, पल में भाई की हत्या कर प्रतिशोध लेता वो भीरु, पल में पापा से हंसी ठिठोली करता वो पात्र अचानक अपनी बिटिया को कैसे गोद में खिला रहा था, और वो लाइन, बेटा तुम कभी बड़ी मत होना बस ऐसे ही रेंगती रहना ये दुनिया बहुत बुरी है नेवर ग्रो अप माई चाइल्ड' कैसे लिख डाली तुमने ओबामा से लेकर कल्लू पनवारी जैसे हर बेटी के बाप के दिल की बात।
और फिर बेटी की बेवफाई से आहत पिता, उसे श्राप देता पिता और फिर श्राप देने में अफ़सोस करता पिता, सचमें माँ पर तो कितने ग्रन्थ आ गए पर बाप के मृसण से मुलायम दिल को तुमने कैसे एक ही पल में चीर कर रख दिया, वो बाप जो दशरथ की तरह तड़फ कर मर जाता है लेकिन बच्चों से अपने दिल की बात नहीं कह पाता।
दिल जीत लिया तुमने रजत-विनय लव यू।
इस प्ले पर जल्द ही विस्तार से लिखूंगी ....

Tuesday, January 31, 2017

Mumbai Local train Vs Mumbai metro

कितनी अकेली हो तुम मेट्रो, उकता नहीं जाती तुम, जलन नहीं होती तुम्हे मुंबई लोकल से।
उस कोनें में देखों वो मोबाइल पर ऊँगली दौड़ाती लड़की, और उस तरफ अपने वन पीस को खिंच खिंच कर घुटने ढ़कने की कोशिश करती लड़की। सर झुकाए औरतों से आई कॉन्टेक्ट अवॉयड करते मर्द, ऊँची मुंडी न करके औरतों को ताकने की कोई कोशिश न करते मर्द।
किसी दूसरे के मोबाईल में झाँकने की कोई कोशिश नहीं।  कोई कोने में दुबक के ठूंस ठूंस के नहीं खा रहा, कोई जोर जोर से चुम्मा चुम्मा दे दे नहीं गा रहा।
बाजू में बैठ कर भी औरतें बात तक नहीं कर रही, किसी ने सीट पर पैर रख कर उकड़ू बैठने की कोशिश तक नहीं की। कोई एक दूसरे की तरह देख कर मुस्कुरा तक नहीं रहा, कुठे जायचा है तुम्हाला पूछना तो दूर की बात हैं।
न सास की बुराई न पति की तारीफ़, न शर्मा जी के बेटे के चर्चे न वर्मा जी की बेटी पर डिस्कशन।
कितनी भीड़ है पर कोई पुढे चला लवकर भी नहीं कह रहा। न नेलपेंट लग रहे है न सब्जी कट रही है।
बस मूर्तियां बैठी हैं। कोई मेरी छोटी सी स्कर्ट के लिए मुझे जज नहीं कर रहा।
कितनी तन्हा हो तुम मेट्रो, आओ किसी दिन मुम्बई लोकल की यात्रा कर लो, आखिर तुम्हे भी तो पता लगे जिंदादिली क्या चीज हैं।
©आशिता दाधीच

Mumbai Local train Vs Mumbai metro

कितनी अकेली हो तुम मेट्रो, उकता नहीं जाती तुम, जलन नहीं होती तुम्हे मुंबई लोकल से।
उस कोनें में देखों वो मोबाइल पर ऊँगली दौड़ाती लड़की, और उस तरफ अपने वन पीस को खिंच खिंच कर घुटने ढ़कने की कोशिश करती लड़की। सर झुकाए औरतों से आई कॉन्टेक्ट अवॉयड करते मर्द, ऊँची मुंडी न करके औरतों को ताकने की कोई कोशिश न करते मर्द।
किसी दूसरे के मोबाईल में झाँकने की कोई कोशिश नहीं।  कोई कोने में दुबक के ठूंस ठूंस के नहीं खा रहा, कोई जोर जोर से चुम्मा चुम्मा दे दे नहीं गा रहा।
बाजू में बैठ कर भी औरतें बात तक नहीं कर रही, किसी ने सीट पर पैर रख कर उकड़ू बैठने की कोशिश तक नहीं की। कोई एक दूसरे की तरह देख कर मुस्कुरा तक नहीं रहा, कुठे जायचा है तुम्हाला पूछना तो दूर की बात हैं।
न सास की बुराई न पति की तारीफ़, न शर्मा जी के बेटे के चर्चे न वर्मा जी की बेटी पर डिस्कशन।
कितनी भीड़ है पर कोई पुढे चला लवकर भी नहीं कह रहा। न नेलपेंट लग रहे है न सब्जी कट रही है।
बस मूर्तियां बैठी हैं। कोई मेरी छोटी सी स्कर्ट के लिए मुझे जज नहीं कर रहा।
कितनी तन्हा हो तुम मेट्रो, आओ किसी दिन मुम्बई लोकल की यात्रा कर लो, आखिर तुम्हे भी तो पता लगे जिंदादिली क्या चीज हैं।
©आशिता दाधीच

Monday, January 30, 2017

Time pass friendship

टाइम पास दोस्त

अरे सोनालिका यह कैसे दोस्त है, तुम्हारी, इतना भी नहीं समझती कि तुम रोमिंग में हो।

कोई बात नहीं माँ , उसे नौकरी नहीं मिल रही वह तनाव में है, मुझसे बात करके हल्की हो जाती है।

(ऑफिस में)

सोनालिका तुम आधे घण्टे से डेस्क पर नहीं थी, बॉस खोज रहे थे तुम्हे, क्या हुआ।

अरे वो मेरी फ्रेंड है ना दीपाली परेशान है, उसे नौकरी नहीं मिल रही, उसका आज का इंटररव्यू भी फेल हुआ, डिप्रेस थी, उसी को ढांढस बंधा रही थी।।

दो महीने बाद

लो लो मिठाई खाओ।

मिठाई क्यों,

मेरी फ्रेंड दीपाली की जॉब लग गई,

वाह गुड़ गुड़।

(एक महीने बाद)

अरे सोनालिका आज कल तुम दीपाली के बारे में कुछ नहीं बता रही, क्या हुआ।।

कुछ नहीं, जॉब लग गई न बीजी हो गई है वो।

(दस दिन बाद)

सोनालिका दीपाली की जॉब कैसी जा रही है।

नही पता रे, बात नही हुई।

(दो महीने बाद)

अरे सोनालिका तो फाइनली तुम्हे अपनी ड्रीम कम्पनी में जॉब मिल ही गई, बधाई हो।।

थैंक्स या

तो इस बार तो दीपाली पार्टी देगी है ना।।

उम्मम उसे अब तक बता नहीं पाई फोन करके ,, जबसे उसकी जॉब लगी उसने फोन नहीं किया तो मुझे आक्वर्ड लग रहा है, उसे फोन करना।

कोई नहीं, तुम फेसबुक अपडेट कर दो, तब तो उसकी कॉल आएगी ही।

(सोनालिका अपडेट करती है, पर दीपाली का फिर भी कभी कोई कॉल नहीं आता)

सोनालिका का बर्थडे

क्यों री दीपाली का आज कॉल नहीं आया, तूने तो उसके बर्थडे पे 12 बजे विश किया था।।

आएगा ना माँ आ जाएगा बीजी होगी कहीं

पर फिर दीपाली का कभी कोई कॉल नहीं आया।।

Friday, January 27, 2017

Karani sena, Padmavati & Sanjay leela Bhansali

राजस्थान, वो प्रदेश जहां की किंवदंती बताती है कि ठण्ड से ठिठुरते एक राहगीर को बचाने के लिए एक बुजुर्ग ने अपनी बेटी को निर्वस्त्र होकर उस राहगीर को गोद में लेकर बैठने के लिए कहा था ताकि गर्मी से उस राहगीर की जान बचाई जा सके।
आतिथ्य सत्कार राजस्थानी रक्त में रहा है। ऐसे ही तो नहीं कहा जाता न, पधारो म्हारे देश।
फिर हे करणी सेना तुम्हे किसने हक़ दिया, किसी कलाकार को पीटने का, ?? हाँ?? अपने महाराणा ने तो सूरज डूबने पर मानसिंह को भी ना मारा था, रोते पछाड़ते शक्तिसिंह को वापिस गले लगा लिया था।
दान, क्षमा, त्याग ये तो राजस्थानी रक्त में सहज आता है। उस जमीन की टाबरी होने पर मुझे हमेशा गर्व रहा लेकिन करणी सेना बधाई हो तुमने मेरा सर शर्म से झुका दिया आज, महज तुम्हारी गन्दी राजनीति के लिए तुमने भामासा जैसों के स्नेह और आतिथ्य सत्कार की पारंपरिक परम्परा पर पानी उंडेल दिया, धिक्कार है।
अमरिया के हाथ से बिलावडा रोटी ले गया तो भी महाराणा ने बिलाव को कुछ नहीं कहा, मीरा विष पी गई पर कुछ न बोली, पन्ना का बेटा कट गया और हाड़ी ने शीश उपहार में दे दिया पर कुछ न बोले और तुम्हे एक फिल्म से आपत्ति हो गई।
करणी सेना
मैं जानती हूँ,
जौहर के साथ हर राजस्थानी की भावना जुडी है, उन 16 हजार वीर राजपूत ललनाओं का जौहर आज भी हर मेवाड़ी, माड़वाडी और शेखावटी की लड़की के लहू में उबाल लाता है।
खिलजी की बर्बरता, गोरा बादल का साहस और पद्मिनी का यौवन परिपूर्ण त्याग न सिर्फ कन्हैया लाल सेठिया बल्कि गढ़ चितौड़ के हर पत्थर ने हमारे खून में उतारा है।
पितामह सेठिया जी के शब्दों में चित्तोड़ खड्यो है मगरा में विकराल भूत सी लिया छिया.।
ट्रेन से गुजरने वाला हर बटाऊ भी गढ़ चितोड़ को देखकर चमकृत हो जाता है, उस गढ़ की शान है पद्मिनी महल, जौहर कुंड और हाँ हमने उस कथा की हमेशा एक ही रूप में सुना है।
अब अचानक कोई नए सिरे से सुनाए तो तकलीफ तो होगी ही, पर जरा रुको देख तो लो कि उसके पास क्या साक्ष्य है।
या कहीं ऐसा तो नहीं कि अगला उसे महज कपोल कल्पना युक्त कथा कह रहा हो, भाई कलाकार है वो उसे हक़ है कला प्रदर्शन करने का। कैसे भूल गए तुम अकबर को उसी के दरबार में पीथळ ने कहा था हिंदवाणों सूरज चमकेलो अकबर की दुनिया सूनी हुई,
तब तुम कैसे किसी की कला को रोक सकते हो, हमारे पृथ्वीराज ने तो 17 बार गौरी को भी माफ़ कर दिया था, तब बिना जाने समझे तुम्हे किसने हक़ दिया राजस्थान को अपनी बपौती समझ कर किसी को पीटने का???? कोई हक नहीं तुम्हे महान राजस्थान की पारलौकिक आतिथ्य संस्कार परम्परा  पर विश्व पटल के समक्ष प्रश्न चिन्ह लगाने का।
- आशिता दाधीच, राजस्थानी छोरी

Thursday, January 26, 2017

Labour

ये बॉस भी न मुझे मेंटली हरैस करने का कोई मौका नहीं छोड़ता। टीम में क्या मैं अकेली हूँ, नौ और लोग है पर नहीं मंडे की क्लाइंट मीटिंग और बुधवार को हैडक्वार्टर से आने वालों के लिए पूरी प्रेजेंटेशन मैं अकेली तैयार करूँ? हद है यार। सन्डे को तो मजदूर भी छुट्टी मनाते है और मैं शिवानी अवस्थी, सीनियर मैनेजर सड़ रही हूँ अकेले ऑफिस में।
हुह आई हेट बॉस।
और यार क्या मस्त गया था मेरा लास्ट सन्डे, घर पर फ्रेंड्स के साथ हाउस पार्टी, डांस, फ़ूड, म्यूजिक वाओ दैट वाज अमेजिंग। लेकिन उस बेवकूफ सपना ने सब खराब कर दिया था। मेरी पूरी रेप्यूटेशन बिगाड़ दी थी, मैंगो शेक कितना मीठा था और पनीर बुर्जी सो ऑयली छी।
काम में ध्यान ही नहीं है उसका, तीन तीन घरों का काम ले रखा है हाथ में करेगी भी कैसे। और...कुछ 16-17 की उमर होगी लड़के ताड़ने से फुर्सत मिले उसे तब तो काम करेगी।
पर मैंने भी अच्छा सबक सिखाया इसे, पिछले सन्डे की पूरी रात उसे जमकर पीटा, अब मिर्च, मसाले और तेल में कोई गलती नहीं होती उससे। (और अवस्थी मैडम मुस्कुराने लगी, साथ ही सन्डे को दफ्तर बुलाने पर बॉस को कोसना भी जारी रहा)
- आशिता दाधीच

Saturday, November 19, 2016

Jhansi ki Rani Lakshmi bai

सोशल मीडिया पर झाँसी की रानी ट्रेंड हो रही हैं, झांसी की रानी, घोड़े पर चढ़ी एके सिंघनी सी औरत, पीठ पर बंधा बच्चा भारतीय माँ का प्रतीक, हाथों में तलवार, "लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार," शायद पहली कक्षा में थी जब पहली बार उनका चित्र देखा था और जैसे उस तस्वीर से मोहब्बत से हो गई, माँ ने उनके बारे में काफी कुछ बताया भी. लेकिन मेरे लिए झांसी की रानी मणिकर्णिका, छबीली, मनु बाई, लक्ष्मी बाई ज़िंदा होकर सामने उतर आई जब पहली बार चौथी कक्षा में सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी झाँसी की रानी कविता पढ़ी, और इस कविता की हर लाइन ने चौहान को मेरी प्रिय कवियत्री बना दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज से भी तो मेरा साबका चौहान ने ही करवाया जब उन्होंने कहा, "वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,"
सुभद्रा मैं तुम्हारी कृतज्ञ हूँ क्योंकि अपनी उस कविता के बूते तुमने मुझे मेरी नायिका दी जिसे मैं प्यार करती हूँ, जिसे मैं खुद में खोजना चाहती हूँ, "तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार....घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी" क्या लिखा तुमने सुभद्रा, झांसी वाली वो रानी जैसे उतर आई मेरी आँखों के आगे.
फिर अचानक उसी सिंघनी में तुमने अभिज्ञान शाकुंतलम की शकुंतला उतार दी, "सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी." शुक्रिया चौहान मुझे वो लक्ष्मी देने के लिए जिससे मैं बेइंतेहा मोहब्बत करती हूँ.
तुम्हारी उन २१ अंतरों की वो कविता मेरे लिए जिंदगी कब बनी मुझे खुद नहीं पता चला. शायद तुम पैदा ही उस कविता को लिखने के लिए हुई थी. महादेवी ने भी तो निराला से तुम्हे कविता कहने वाली लड़की कह कर ही मिलाया था.
तुमने मेरे लिए झांसी की उस रानी को महानायिका बना दिया, आज भी कम से कम ४०० बार तुम्हारी वो कविता पढ़ने के बाद भी आज भी जब मैं गुनगुनाती हूँ, "रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में, ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी," रौंगटे खड़े हो जाते है "काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी," खून गर्म हो जाता है. "मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी, अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी," आंसू लुढ़क पड़ते है.
मेरे लिए लक्ष्मी तुम्हारी कलम से जीवित हुई सुभद्रा। सुभद्रा वो नाम जो कृष्ण की बहन थी, अर्जुन की शक्ति और अभिमन्यु की माँ, जो अमर रख गई पांडव वंश का बीज, बिलकुल वैसे ही तुम हमारे दिलों में लक्ष्मी बाई नाम की वह चिंगारी जगा गई जो कभी नहीं बुझेगी सुभद्रा।
"बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान" तुम्हे झाँसी की उस रानी के मार्फ़त भारतीय नारी के सम्मान की अचूक पुनर्स्थापना की है, और उसके लिए तुम्हे शुक्रिया सुभद्रा। "बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी," तुम्हारी छबीली साक्षात माँ शारदा थी हर कला में निपुण, लक्ष्मी तो वो थी ही, " हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में," और उस सी काली, चंडी, जगदम्बा तो वैसे ही हमें मिली ही कितनी थी.
अपनी अद्वितीय कलम से तुमने लक्ष्मी को अमर कर दिया, "जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी."
कई वीरांगनाएं सिर्फ सुभद्रा न होने के चलते इतिहास की किताबों से बारहवें से पन्द्रहवें पन्ने और शिक्षा विभाग की पाठ्यक्रम तय करने के मुबाहिसों के दरमियान ही दम तोड़ गयी. शुक्रिया सुभद्रा, हमें हमारी प्रेरणा देने के लिए, हमें लक्ष्मी देने के लिए.
© आशिता दाधीच।